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नही रहे दलितों के गणितज्ञ मास्टर रामप्रसाद गुप्ता :

दिनांक 23 फरवरी 2021 को सुबह के 3 बजे बनारस हिंदू विश्विद्यालय अस्पताल में आखिरी सांस लिया।

Photo: Bhaishkrit Bharat - Ramprasad Gupta

सादगी के प्रतीक, महात्मा गांधी के साक्षात छवि, गरीबो, वंचितों, दलितों को के लिए सदा न्याय की अंतिम मोहर लगाने वाले, अध्यापक मास्टर रामप्रसाद गुप्ता का बीती सुबह 3 बजे (मंगलवार , 23 फरवरी 2021) परिनिर्वाण हो गया। वह तरकीबन  84 वर्ष के थे।  बढ़ती उम्र के कारण भी गांधीवादी आदर्शो पर चलते हुए वह शारीरिक रूप से स्वस्थ थे परंतु मौसमी बीमारी "निमोनिया" के कारण उन्होंने वाराणसी के बीएचयू अस्पताल में अंतिम सांस ली। आम तौर पर उन्हें गरीबो खास कर दलितों के पंचायत में न्यायमूर्ति और "पंचायत तोड़क" के रूप में जाना गया। उन्होंने अपना जीवन उत्तर प्रदेश सरकार के अधिनस्त एक गणित अध्यापक के रूप में बिताया।

ग्रामीण जीवन मे सादगी के प्रतीक तथा महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलने वाले गणितज्ञ मास्टर रामप्रसाद गुप्ता जी के परिनिर्वाण की खबर मिलते ही बहुजन समाज उनके देश भर में व्याप्त प्रसंसको में में शोक की लहर दौड़ गयी।
उनका जन्म उत्तर प्रदेश के पूर्व के जनपद वाराणसी तथा आज के जनपद चंदौली के पोस्ट भदौलिया, ग्राम कुरई में सन 1937 में हुआ था। गरीबी और गरीबो के बीच रह कर इन्होंने अपना अध्ययन जारी रख कर गणित विषय मे शिक्षा पूर्ण किया तथा नार्मल स्कूल से ट्रेनिंग के बाद तब के वाराणसी जिले में प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में कार्य प्रारंभ किया, तथा पूर्णतः जीवन गणित के अध्यापन में व्यतीत किया।

दलितों के पंचायत तोड़क बने।


ये अध्यापन काल मे ही ये सामाजिक मुद्दों पर रुचि लेने लगे। इनकी कार्यकुशलता और सामाजिक न्याय की भावना को देखते हुए उन दिनों हासिये पर मौजूद, तथा बेहद दर्दनाक अवस्था मे जी रहा दलित समाज ने इनकी गांधीवादी मृदुलता और अम्बेडकरवादी न्यायिक दृश्टिकोण को देखते हुए रामप्रकाश गुप्ता जी को मास्टर साहब की उपाधि प्रदान किया। ये वो दौर था जब दलित समाज के लोगों के पैर में चप्पल नही हुआ करता था। समाज उन दिनों दिन भर की मजदूरी के रूप में पौना सेर अर्थात ( पेट भरने के लिए पर्याप्त का 75% अनाज) प्राप्त करता था। आजादी बिल्कुल दुल्हन थी, तथा दलितों की जीवन शैली उन दिनों जैसी भी थी उसे ही प्रगतिशीलता का तमगा प्राप्त था। उन दिनों मास्टर रामप्रकाश गुप्ता दलितों खास कर चमारों और आदिवाशी बियारो में न्यायिक नौकरशाह के रूप में जाने गए।

ये वह दौर था जब सरकारी चपरासी को भी जनता साहब कहकर सलामी देती थी। उन दिनों मास्टर रामप्रकाश जी सरकारी अध्यापक थे, इन्होंने अपने समाजवादी दृष्टिकोण और मानवीय स्वभाव से दलितों में विश्वाश पैदा कर लिया, इसका परिणाम यह हुआ कि, दूर दराज के दलित समाज किसी भी तरह की समस्या, विवाद इत्यादि के उत्त्पन्न होने पर आयोजित पंचायत में मास्टर साहब को बुलाया जाने का दौर शुरू हुआ।

मास्टर रामप्रकाश गुप्ता जी ने भी अपना दायित्व बखूबी निभाया। उनका न्याय सदा परिवारिक एकता को आधारबिंदु मानकर सुलह और त्याग करके आदर्श जीवन जीने के लिए समर्पित रहा।


Photo- Bahishkrit BHarat - Ramprasad Gupta

तेली समाज मे जन्मे, अछूतों के दर्द को समझा


मास्टर रामप्रसाद गुप्ता जी बहुजन समाज के तेली परिवार में जन्मे थे, लेकिन तात्कालिक दौरे में यह समाज हिंदुत्व की विकल्प की मजबूरी के कारण ब्राह्मण धर्म की वर्णव्यवस्था के वैश्य (बनिया) से खुद को जोड़ने में प्रयत्नशील था, उस दौर में भी मास्टर साहब ने अपने परिवार को बहुजनो के प्रति चैतन्य रखा, जिसका परिणाम यह हुआ कि आज उनके कनिष्क सुपुत्र ओम प्रकाश जी भारत के शीर्ष पांच हार्डकोर बहुजन नेताओ में से एक जाने जाते हैं। तथा विश्व पटल पर जब दलितों और बहुजनो की बात को मेरिट के आधार पर रखने की आवश्यकता पड़ती है तब ओमप्रकाश गुप्ता जी को याद किया जाता है।

टेलीविजन के दुश्मन के रूप में मशहूर रहे मास्टर साहब।


आज 21 वी सदी में टेलीविजन का विरोध कुछ नामचीन पत्रकार मसलन श्री रविश कुमार जी, श्री शभुनाथ सिंह, श्री उर्मेश आमिल और सतीश चौधरी जैसे टीवी पर दिखने वाले जैसे दिग्गज लोग बाकायदा कर रहे हैं और जनता से टीवी नही देखने का बराबर अनुरोध कर रहे हैं, उनका तर्क है कि यह टीवी भारत की बहुसंख्यक बहुजन जनता को एक अल्पसंख्यक वर्ग की शासक सरकार का गुलामी करने हेतु मजबूर करने का साधन मात्र है।

ऐसा ही कभी 1985 के दौर में मान्यवर कांशीराम जी का आंदोनल जब शुरू हुआ तो उन्होंने इस भारत की तथाकथित मुख्यधारा की टीवी और मीड़िया का पोस्टमार्डन करके उसे ब्राह्मण बनिया का मनुवादी मीड़िया घोषित किया तथा उनके लिए "मनुवादी मीडिया हुस्स हुस्स" का नारा लगाया।

दिसंबर 2020 में जब बहिष्कृत भारत की टीम मास्टर साहब के गांव में गयी तो हर किसी से यही सुनने को पाया कि मास्टर साहब अपने दिनों में टेलीविजन के प्रति दुश्मन जैसा व्यवहार करते थे। बच्चों को मनोरंजन के काल्पनिक मनगढंत धारावाहिक इत्यादि तक के लिए लिए बेहद कठोर थे। और  घर पर आते ही टीवी बंद कर देते थे। ये वह दौर था जब बहुजन समाज का व्यक्ति अपने परिवार का भी हित ठीक से सोच नही पाता था, उन दिनों में मास्टर साहब मनुवादी टेलीविजिन व्यवस्था के खिलाफ थे, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी व्यथा का जिक्र नही किया।

गणितज्ञ थे, इस लिए प्रतिउत्तर सिर्फ मुस्कुरा कर देते थे।


आज जब मास्टर रामप्रसाद गुप्ता जी स्मृति शेष हैं, तब यह लाजिम है उनके दौर में उनकी अवस्थाओं पर दृष्टि डालना।

ये वो दौर था जब बहुजन समाज के सरकार कर्मचारी या ओहदेदार के लिए सबसे कठिन अवस्था होती थी शोषित समाज और उच्च वर्ग के सवर्ण समाज के बीच मे अपनी निष्ठा तय करना। क्योंकि ओहदेदार के लिए जरूरी रहता था स्वर्ण समाज के प्रति हर समय अपना निष्ठा जाहिर करना, तभी विभागों में सम्मान मिलता था या तो दूसरी ओर अपने खुद के बहुजन समाज के लिए भी दयायित्व था कि उनका मार्गदर्शन करते रहना।
चूंकि मास्टर साहब एक गणितज्ञ थे, थोड़ा सा स्वभाव से गुसैल थे लेकिन सामाजिक दयायित्व पर उन्होंने हमेशा गणित का प्रयोग किया। हर दयायित्व में उन्होंने मुस्कुराकर सामना किया। नैतिकता को आधार बनाकर गरीबो का मार्गदर्शन किया, जिसकारण कोई भी पक्ष उनपर कभी अंगुली नही उठा सका।

अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि

प्रधान संपादक